Friday, December 14, 2007

फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़

फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़
गर्म बाज़ार-ए-फ़ौजदारी है

हो रहा है जहाँ में अँधेर
ज़ुल्फ़ की फिर सरिश्तादारी है

फिर दिया पारा-ए-जिगर ने सवाल
एक फ़रियाद-ओ-आह-ओ-ज़ारी है

फिर हुए हैं गवाह-ए-इश्क़ तलब
अश्क़बारी का हुक्मज़ारी है

दिल-ओ-मिज़श्माँ का जो मुक़दमा था
आज फिर उस की रूबक़ारी है

बेख़ूदी बेसबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

1 comment:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत खूब। आपने गालिब की रचनाओं को एक जगह संजो कर बहुत अच्छा काम किया है। बहुत बहुत बधाई।