Showing posts with label गए. Show all posts
Showing posts with label गए. Show all posts

Sunday, December 16, 2007

रोने से और् इश्क़ में बेबाक हो गए

रोने से और् इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए

सर्फ़-ए-बहा-ए-मै हुए आलात-ए-मैकशी
थे ये ही दो हिसाब सो यों पाक हो गए

रुसवा-ए-दहर गो हुए आवार्गी से तुम
बारे तबीयतों के तो चालाक हो गए

कहता है कौन नाला-ए-बुलबुल को बेअसर
पर्दे में गुल के लाख जिगर चाक हो गए

पूछे है क्या वजूद-ओ-अदम अहल-ए-शौक़ का
आप अपनी आग से ख़स-ओ-ख़ाशाक हो गए

करने गये थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला
की एक् ही निगाह कि बस ख़ाक हो गए

इस रंग से उठाई कल उस ने 'असद' की नाश
दुश्मन भी जिस को देख के ग़मनाक हो गए

रुसवा-ए-दहर : Disgraced in the world
नाला-ए-बुलबुल : Nightingale's lament
ख़स-ओ-ख़ाशाक : Sticks and straws, litter, rubbish
ख़ाशाक: Sweepings, chips, shavings, leaves