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Tuesday, December 11, 2007

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही
इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही

ख़ार-ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है
शौक़ गुलचीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही

मय परस्ताँ ख़ूम-ए-मय मूंह से लगाये ही बने
एक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही

नफ़ज़-ए-क़ैस के है चश्म-ओ-चराग़-ए-सहरा
गर नहीं शम-ए-सियहख़ाना-ए-लैला न सही

एक हंगामे पे मौकूफ़ है घर की रौनक
नोह-ए-ग़म ही सही, नग़्मा-ए-शादी न सही

न सिताइश की तमन्ना न सिले की परवाह्
गर नहीं है मेरे अशार में माने न सही

इशरत-ए-सोहबत-ए-ख़ुबाँ ही ग़नीमत समझो
न हुई "ग़ालिब" अगर उम्र-ए-तबीई न सही

Sunday, November 25, 2007

`इश्‌क़ मुझ को नहीं वह्‌शत ही सही

`इश्‌क़ मुझ को नहीं वह्‌शत ही सही
मेरी वह्‌शत तिरी शुह्‌रत ही सही

क़त`अ कीजे न त`अल्‌लुक़ हम से
कुछ नहीं है तो `अदावत ही सही

मेरे होने में है क्‌या रुस्‌वाई
अय वह मज्‌लिस नहीं ख़ल्‌वत ही सही

हम भी दुश्‌मन तो नहीं हैं अप्‌ने
ग़ैर को तुझ से मुहब्‌बत ही सही

अप्‌नी हस्‌ती ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़्‌लत ही सही

`उम्‌र हर-चन्‌द कि है बर्‌क़-ख़िराम
दिल के ख़ूं करने की फ़ुर्‌सत ही सही

हम कोई तर्‌क-ए वफ़ा कर्‌ते हैं
न सही `इश्‌क़ मुसीबत ही सही

कुछ तो दे अय फ़लक-ए ना-इन्‌साफ़
आह-ओ-फ़र्‌याद की रुख़्‌सत ही सही

हम भी तस्‌लीम की ख़ू डालेंगे
बे-नियाज़ी तिरी `आदत ही सही

यार से छेड़ चली जाए असद
गर नहीं वस्‌ल तो हस्‌रत ही सही


तलत महमूद की आवाज़ मे सुने

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