Showing posts with label हो. Show all posts
Showing posts with label हो. Show all posts

Sunday, November 25, 2007

रह्‌ये अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो

रह्‌ये अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बां कोई न हो

बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये
कोई हम-सायह न हो और पास्‌बां कोई न हो

पड़्‌ये गर बीमार तो कोई न हो बीमार-दार
और अगर मर जाइये तो नौहह-ख़्‌वां कोई न हो


Listen in voice of Surraiya

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

गई वह बात कि हो गुफ़्‌तगो तो क्‌यूंकर हो

गई वह बात कि हो गुफ़्‌तगो तो क्‌यूंकर हो
कहे से कुछ न हुआ फिर कहो तो क्‌यूंकर हो

हमारे ज़ह्‌न में उस फ़िक्‌र का है नाम विसाल
कि गर न हो तो कहां जाएं हो तो क्‌यूंकर हो

अदब है और यिही कश्‌मकश तो क्‌या कीजे
हया है और यिही गोमगो तो क्‌यूंकर हो

तुम्‌हीं कहो कि गुज़ारा सनम-परस्‌तों का
बुतों की हो अगर ऐसी ही ख़ो तो क्‌यूंकर हो

उलझ्‌ते हो तुम अगर देख्‌ते हो आईनह
जो तुम से शह्‌र में हों एक दो तो क्‌यूंकर हो

जिसे नसीब हो रोज़-ए सियाह मेरा सा
वह शख़्‌स दिन न कहे रात को तो क्‌यूंकर हो

हमें फिर उन से उमीद और उंहें हमारी क़द्‌र
हमारी बात ही पूछें न वो तो क्‌यूंकर हो

ग़लत न था हमें ख़त पर गुमां तसल्‌ली का
न माने दीदह-ए दीदार-जो तो क्‌यूंकर हो

बताओ उस मिज़हह को देख कर कि मुझ को क़रार
यह नेश हो रग-ए जां में फ़िरो तो क्‌यूंकर हो

मुझे जुनूं नहीं ग़ालिब वले ब क़ौल-ए हुज़ूर
फ़िराक़-ए यार में तस्‌कीन हो तो क्‌यूंकर हो

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्‌म-ओ-राह हो

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्‌म-ओ-राह हो
मुझ को भी पूछ्‌ते रहो तो क्‌या गुनाह हो

बच्‌ते नहीं मुवाख़ज़ह-ए रोज़-ए हश्‌र से
क़ातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो

क्‌या वह भी बे-गुनह-कुश-ओ-हक़ ना-शिनास हैं
माना कि तुम बशर नहीं ख़्‌वुर्‌शीद-ओ-माह हो

उभ्‌रा हुआ नक़ाब में है उन के एक तार
मर्‌ता हूं मैं कि यह न किसी की निगाह हो

जब मै-कदह छुटा तो फिर अब क्‌या जगह की क़ैद
मस्‌जिद हो मद्‌रसह हो कोई ख़ानक़ाह हो

सुन्‌ते हैं जो बिहिश्‌त की त`रीफ़ सब दुरुस्‌त
लेकिन ख़ुदा करे वह तिरा जल्‌वह-गाह हो

ग़ालिब भी गर न हो तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
दुन्‌या हो या रब और मिरा बाद्‌शाह हो