Friday, February 15, 2008

फिर इस अंदाज़ से बहार आई

फिर इस अंदाज़ से बहार आई
के हुये मेहर-ओ-माह तमाशाई

देखो ऐ सकिनान-ए-खित्ता-ए-ख़ाक
इस को कहते हैं आलम-आराई

के ज़मीं हो गई है सर ता सर
रूकश-ए-सतहे चर्ख़े मिनाई

सब्ज़े को जब कहीं जगह न मिली
बन गया रू-ए-आब पर काई

सब्ज़-ओ-गुल के देखने के लिये
चश्म-ए-नर्गिस को दी है बिनाई

है हवा में शराब की तासीर
बदानोशी है बाद पैमाई

क्यूँ न दुनिया को हो ख़ुशी "ग़ालिब"
शाह-ए-दीदार ने शिफ़ा पाई

4 comments:

एस. बी. सिंह said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आया। बहुत शानदार काम कर रहे हैं आप। साधुवाद

Basanta Gautam said...

I was searching something related to OSHO and reached at your blogs. You have great blogs. Thank you for maintaining such beautiful blogs.

अर्कजेश said...

गूगल से गालिब की शायरी ढूंढते हुए आया । बहुत शुक्रिया ।

RAVI SHANKAR SINGH said...

Mazaa aa gya shriman


aap yu kary karte rahe ishwar se yahi prarthna hai