Friday, January 7, 2011

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़गान-ए-यार था

अब मैं हूँ और मातम-ए-यक शहर-ए-आरज़ू
तोड़ा जो तू ने आईना तिम्सालदार था

गलियों में मेरी नाश को खेंचे फिरो कि मैं
जाँ दाद-ए-हवा-ए-सर-ए-रहगुज़ार था

मौज-ए-सराब-ए-दश्त-ए-वफ़ा का न पूछ हाल
हर ज़र्रा मिस्ले-जौहरे-तेग़ आबदार था

कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब
देखा तो कम हुए पे ग़म-ए-रोज़गार था

1 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

मुझे हमेशा आश्चर्य होता रहा है जब देखता हूं कि कोई इतनी मेहनत कर रहा हो, लिख रहा हो, वह भी उम्दा..उसे लोग पढ नहीं रहे हैं, जबकि आलतू-फालतू आलेखों पर ढेरों टिप्पणियां देखता हूं। खैर..यह लेखक का दोष नहीं बल्कि उन पाठको का दोष है जो अच्छी चीजों से दूर छूट रहे हैं।

आपके ब्लॉग पर अपने एक मित्र के जरिये आना हुआ, और पूरी तरह संतुष्टि प्राप्त हुई..आना जारी रहेगा..आपकी लगन, जानकारी और गालिब चचा के वृहद विषय पर सतत लेखन देख कर हतप्रभ हूं..। आपको धन्यवाद दूंगा..