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Friday, January 7, 2011

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़गान-ए-यार था

अब मैं हूँ और मातम-ए-यक शहर-ए-आरज़ू
तोड़ा जो तू ने आईना तिम्सालदार था

गलियों में मेरी नाश को खेंचे फिरो कि मैं
जाँ दाद-ए-हवा-ए-सर-ए-रहगुज़ार था

मौज-ए-सराब-ए-दश्त-ए-वफ़ा का न पूछ हाल
हर ज़र्रा मिस्ले-जौहरे-तेग़ आबदार था

कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब
देखा तो कम हुए पे ग़म-ए-रोज़गार था

Friday, February 15, 2008

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था
आप आते थे मगर कोई इनाँगीर भी था

तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उस में कुछ शाइब-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूँ
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख़्चीर भी था

क़ैद में थी तेरे वहशी को तेरी ज़ुल्फ़ की याद
हाँ कुछ एक रंज-ए-गिराँबारि-ए-ज़ंजीर भी था

बिजली एक कौंध गई आँखों के आगे, तो क्या
बात करते, कि मैं लब तश्ना-ए-तक़रीर भी था

यूसुफ़ उस को कहूँ और कुछ न कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे तो मैं लायक़-ए-ता'ज़ीर भी था

देख कर ग़ैर को क्यूँ हो न कलेजा ठंडा
नाला करता था वले तालिब-ए-तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिये न फ़रहाद को नाम
हम ही आशुफ़्तासरों में वो जवाँ मीर भी था

हम थे मरने को खड़े पास न आया न सही
आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकड़े जाते हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दम-ए-तहरीर भी था

रेख्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो "ग़ालिब"
कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था

Monday, October 22, 2007

आईनह देख अप्‌ना-सा मुंह ले के रह गये

आईनह देख अप्‌ना-सा मुंह ले के रह गये
साहिब को दिल न देने पह कित्‌ना ग़ुरूर था

क़ासिद को अप्‌ने हाथ से गर्‌दन न मारिये
उस की ख़ता नहीं है यह मेरा क़सूर था

Saturday, August 11, 2007

धम्‌की में मर गया जो न बाब-ए नबर्‌द था

धम्‌की में मर गया जो न बाब-ए नबर्‌द था
`इश्‌क़-ए नबर्‌द-पेशह तलब्‌गार-ए मर्‌द था

था ज़िन्‌दगी में मर्‌ग का खट्‌का लगा हुआ
उड़्‌ने से पेश्‌तर भी मिरा रन्‌ग ज़र्‌द था

तालीफ़-ए नुस्‌ख़हहा-ए वफ़ा कर रहा था मैं
मज्‌मू`अह-ए ख़याल अभी फ़र्‌द फ़र्‌द था

दिल ता जिगर कि साहिल-ए दर्‌या-ए ख़ूं है अब
उस रह्‌गुज़र में जल्‌वह-ए गुल आगे गर्‌द था

जाती है कोई कश्‌मकश अन्‌दोह-ए `इश्‌क़ की
दिल भी अगर गया तो वुही दिल का दर्‌द था

अह्‌बाब चारह-साज़ी-ए वह्‌शत न कर सके
ज़िन्‌दां में भी ख़याल बियाबां-नवर्‌द था

यह लाश-ए बे-कफ़न असद-ए ख़स्‌तह-जां की है
हक़ मग़्‌फ़रत करे `अजब आज़ाद मर्‌द था

Thursday, August 9, 2007

जुज़ क़ैस और कोई न आया ब रू-ए कार

जुज़ क़ैस और कोई न आया ब रू-ए कार
सह्‌रा मगर ब तन्‌गी-ए चश्‌म-ए हसूद था

आशुफ़्‌तगी ने नक़्‌श-ए सुवैदा किया दुरुस्‌त
ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सर्‌मायह दूद था

था ख़्‌वाब में ख़ियाल को तुझ से मु`आमिलह
जब आंख खुल गई न ज़ियां था न सूद था

लेता हूं मक्‌तब-ए ग़म-ए दिल में सबक़ हनूज़
लेकिन यिही कि रफ़्‌त गया और बूद था

ढांपा कफ़न ने दाग़-ए `उयूब-ए बरह्‌नगी
मैं वर्‌नह हर लिबास में नन्‌ग-ए वुजूद था

तेशे बग़ैर मर न सका कोह्‌कन असद
सर्‌गश्‌तह-ए ख़ुमार-ए रुसूम-ओ-क़ुयूद था