Showing posts with label देखते हैं. Show all posts
Showing posts with label देखते हैं. Show all posts

Tuesday, January 15, 2008

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं

Saturday, October 27, 2007

बना कर फ़क़ीरों का हम-भेस ग़ालिब

जहां तेरा नक़्‌श-ए क़दम देख्‌ते हैं
ख़ियाबां ख़ियाबां इरम देख्‌ते हैं

दिल आशुफ़्‌तगां ख़ाल-ए कुन्‌ज-ए दहन के
सुवैदा में सैर-ए `अदम देख्‌ते हैं

तिरे सर्‌व-ए क़ामत से यक क़द्‌द-ए आदम
क़ियामत के फ़ित्‌ने को कम देख्‌ते हैं

तमाशा कि ऐ मह्‌व-ए आईनह-दारी
तुझे किस तमन्‌ना से हम देख्‌ते हैं

सुराग़-ए तफ़-ए नालह ले दाग़-ए दिल से
कि शब-रौ का नक़्‌श-ए क़दम देख्‌ते हैं

बना कर फ़क़ीरों का हम-भेस ग़ालिब
तमाशा-ए अह्‌ल-ए करम देख्‌ते हैं