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Tuesday, January 15, 2008

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं

Friday, December 14, 2007

फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़

फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़
गर्म बाज़ार-ए-फ़ौजदारी है

हो रहा है जहाँ में अँधेर
ज़ुल्फ़ की फिर सरिश्तादारी है

फिर दिया पारा-ए-जिगर ने सवाल
एक फ़रियाद-ओ-आह-ओ-ज़ारी है

फिर हुए हैं गवाह-ए-इश्क़ तलब
अश्क़बारी का हुक्मज़ारी है

दिल-ओ-मिज़श्माँ का जो मुक़दमा था
आज फिर उस की रूबक़ारी है

बेख़ूदी बेसबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

फिर कुछ इस दिल् को बेक़रारी है

फिर कुछ इस दिल् को बेक़रारी है
सीना ज़ोया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है

फिर जिगर खोदने लगा नाख़ून
आमद-ए-फ़स्ल-ए-लालाकारी है

क़िब्ला-ए-मक़्सद-ए-निगाह-ए-नियाज़
फिर वही पर्दा-ए-अम्मारी है

चश्म-ए-दल्लल-ए-जिन्स-ए-रुसवाई
दिल ख़रीदार-ए-ज़ौक़-ए-ख़्बारी है

वही सदरंग नाला फ़र्साई
वही सदगूना अश्क़बारी है

दिल हवा-ए-ख़िराम-ए-नाज़ से फिर
महश्रिस्ताँ-ए-बेक़रारी है

जल्वा फिर अर्ज़-ए-नाज़ करता है
रोज़-ए-बाज़ार-ए-जाँसुपारी है

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है

जगजीत सिंह की आवाज़ मे सुने
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Friday, November 30, 2007

ज़ुल्‌मत-कदे में मेरे शब-ए ग़म का जोश है

ज़ुल्‌मत-कदे में मेरे शब-ए ग़म का जोश है
इक शम`अ है दलील-ए सहर सो ख़मोश है

ने मुज़ह्‌दह-ए विसाल न नज़्‌ज़ारह-ए जमाल
मुद्‌दत हुई कि आश्‌ती-ए चश्‌म-ओ-गोश है

मै ने किया है हुस्‌न-ए ख़्‌वुद-आरा को बे-हिजाब
अय शौक़ हां इजाज़त-ए तस्‌लीम-ए होश है

गौहर को `उक़्‌द-ए गर्‌दन-ए ख़ूबां में देख्‌ना
क्‌या औज पर सितारह-ए गौहर-फ़रोश है

दीदार बादह हौस्‌लह साक़ी निगाह मस्‌त
बज़्‌म-ए ख़याल मै-कदह-ए बे-ख़रोश है

अय ताज़ह-वारिदान-ए बिसात-ए हवा-ए दिल
ज़िन्‌हार अगर तुम्‌हें हवस-ए नै-ओ-नोश है

देखो मुझे जो दीदह-ए `इब्‌रत-निगाह हो
मेरी सुनो जो गोश-ए नसीहत-नियोश है

साक़ी ब जल्‌वह दुश्‌मन-ए ईमान-ओ-आगही
मुत्‌रिब ब नग़्‌मह रह्‌ज़न-ए तम्‌कीन-ओ-होश है

या शब को देख्‌ते थे कि हर गोशह-ए बिसात
दामान-ए बाग़्‌बान-ओ-कफ़-ए गुल-फ़रोश है

लुत्‌फ़-ए ख़िराम-ए साक़ी-ओ-ज़ौक़-ए सदा-ए चन्‌ग
यह जन्‌नत-ए निगाह वह फ़िर्‌दौस-ए गोश है

या सुब्‌ह-दम जो देखिये आ कर तो बज़्‌म में
ने वह सुरूर-ओ-सोज़ न जोश-ओ-ख़रोश है

दाग़-ए फ़िराक़-ए सुह्‌बत-ए शब की जलि हुई
इक शम`अ रह गई है सो वह भी ख़मोश है

आते हैं ग़ैब से यह मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब सरीर-ए ख़ामह नवा-ए सरोश है

Thursday, November 29, 2007

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पे रौनक

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पे रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।

देखिए पाते हैं उशशाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बराह्मन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।

जगजीत सिंह की आवाज़ मे सुने
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Sunday, November 25, 2007

तुम अप्‌ने शिक्‌वे की बातें न खोद खोद के पूछो

तुम अप्‌ने शिक्‌वे की बातें न खोद खोद के पूछो
हज़र करो मिरे दिल से कि उस में आग दबी है

दिला यह दर्‌द-ओ-अलम भी तो मुग़्‌तनिम है कि आख़िर
न गिर्‌यह-ए सहरी है न आह-ए नीम-शबी है

Saturday, October 27, 2007

बना कर फ़क़ीरों का हम-भेस ग़ालिब

जहां तेरा नक़्‌श-ए क़दम देख्‌ते हैं
ख़ियाबां ख़ियाबां इरम देख्‌ते हैं

दिल आशुफ़्‌तगां ख़ाल-ए कुन्‌ज-ए दहन के
सुवैदा में सैर-ए `अदम देख्‌ते हैं

तिरे सर्‌व-ए क़ामत से यक क़द्‌द-ए आदम
क़ियामत के फ़ित्‌ने को कम देख्‌ते हैं

तमाशा कि ऐ मह्‌व-ए आईनह-दारी
तुझे किस तमन्‌ना से हम देख्‌ते हैं

सुराग़-ए तफ़-ए नालह ले दाग़-ए दिल से
कि शब-रौ का नक़्‌श-ए क़दम देख्‌ते हैं

बना कर फ़क़ीरों का हम-भेस ग़ालिब
तमाशा-ए अह्‌ल-ए करम देख्‌ते हैं